महाराजा खेतसिंह खंगार: राजपूतों के प्रथम 'सिंह'
महाराजा खेतसिंह खंगार (कुँवर खेता) भारतीय इतिहास के एक ऐसे प्रतापी योद्धा थे, जिनकी वीरता और साहस की कहानियाँ आज भी बुंदेलखंड और उत्तर भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित हैं। वे खंगार राजवंश के संस्थापक और गढ़कुंडार के अधिपति थे।
प्रारंभिक जीवन और अभिरुचि
कुँवर खेता का जन्म एक प्रतापी क्षत्रिय परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनकी रुचि सामान्य खेलों के बजाय युद्ध कौशल में अधिक थी।
मल्ल-युद्ध: उन्हें कुश्ती लड़ने का बहुत शौक था और वे अपने समय के अजेय योद्धा माने जाते थे।
शस्त्र विद्या: तलवार चलाने और सैन्य संचालन में वे बाल्यकाल से ही निपुण हो गए थे।
पृथ्वीराज चौहान से मिलन
इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना तब घटी जब दिल्ली (इन्द्रप्रस्थ) के सम्राट पृथ्वीराज चौहान सौराष्ट्र (गुजरात) की यात्रा पर थे। वहाँ उन्होंने एक अत्यंत साहसी दृश्य देखा:
एक युवा वीर (कुँवर खेता) निर्भय होकर एक हिंसक सिंह से युद्ध कर रहा था।उनकी इस अद्भुत वीरता को देखकर सम्राट पृथ्वीराज चकित रह गए।सम्राट ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अपने साथ दिल्ली चलने का निमंत्रण दिया। कुँवर खेता ने अपने पिता की आज्ञा ली और सम्राट के साथ इन्द्रप्रस्थ आ गए।
शेरपुर की घटना और 'सिंह' की उपाधि
दिल्ली प्रवास के दौरान एक बार सम्राट और उनके साथी शेरपुर के जंगलों में शिकार के लिए गए। वहाँ एक विशाल सिंह ने अचानक आक्रमण कर दिया। उस विकट परिस्थिति में कुँवर खेता ने अपनी असाधारण शक्ति का परिचय दिया:
1.उन्होंने निहत्थे होकर उस भयानक सिंह का सामना किया।
2.किंवदंतियों के अनुसार, उन्होंने अपनी भुजाओं के बल से सिंह के जबड़ों को चीर दिया।
इस अकल्पनीय साहस को देखकर पृथ्वीराज चौहान अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने कुँवर खेता को 'सिंह' की उपाधि से विभूषित किया।ऐतिहासिक महत्व: माना जाता है कि इसी घटना के बाद राजपूतों के नाम के पीछे 'सिंह' लगाने की परंपरा को एक नई प्रतिष्ठा मिली और उन्हें "राजपूतों में प्रथम सिंह" कहा जाने लगा।
गौरवशाली पंक्तियाँ
महाराजा खेतसिंह की कीर्ति को इन पंक्तियों में बखूबी समेटा गया है:
“था अधिपति वो भूप जिसकी कृति ये कुंडार । राजपूतों में प्रथम सिंह जय महाराजा खेत खंगार ।।”
निष्कर्ष
महाराजा खेतसिंह खंगार केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि न्यायप्रिय शासक भी थे। उन्होंने गढ़कुंडार को अपनी राजधानी बनाया और एक शक्तिशाली राज्य की नींव रखी। उनका जीवन हमें सिखाता है कि साहस और निष्ठा के बल पर व्यक्ति इतिहास में अमर स्थान प्राप्त कर सकता है। गढ़कुंडार का किला आज भी उनकी वीरता और वैभव का साक्षी बनकर खड़ा है।
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